हम भी है राहों में
लेख:- हम भी है राहों में हमें अक्सर कुछ ऐसे लोग दिख जाते है जो बहुत ही दयनीय अवस्था मे होते है। ऐसे लोग सड़क के किनारे, डिवाइडर पर बैठे हुये और इधर-उधर घूमते हुये दिखाई पड़ते है। ये फटे-पुराने कपड़े व चिथड़े लपेटे हुये होते है। कभी ये अर्ध या कभी पूर्णरूप से नग्नावस्था मे भी घूमते-फिरते दिखायी मिल जाते है। कौन है ये लोग? क्या इनका भी कोई अपना है इस दुनिया मे? क्या ये लोग हमेशा से ही ऐसे थे? क्या ऐसे प्रश्न आपके जहन मे आये कभी? क्या इन्हे देखकर इनके लिये हमें कुछ करना चाहिए? वास्तव मे, ऐसे लोग मानसिक रूप से विक्षिप्त होता है। इन्हे न तो अपना होश होता है और न ही इस दुनिया का। यहां तक ये अपना नाम और पहचान भी भूल चुके होते है। न ही इनका कोई घर होता है और न ही ठिकाना। ये अवारा यायावर बनकर अनन्त अंधकार की ओर बस चला करते है। इन्हे जाड़ा,गर्मी,बरसात से कोई फ़र्क नही पड़ता। चाहे पतझड़ हो या बसंत बहार किन्तु इनके जीवन मे सिर्फ होता है असीम अन्धकार। आखिर इनकी हालत ऐसी कैसे हो गयी? इनके घरवालों इन्हे घर ले जाकर इनकी देखभाल क्यो नही करते? इन बातों पर विचार अति आवश्यक हो जाता है। कुछ लोगों को छोड़कर बाक...