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क्षेत्रपाल

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सूखी धरती की देख दरारें भृकुटी पर बन गयी मेरी धराये। नित नवीन चिन्ता में रहता हूं सब सहता हूँ चुप रहता हूँ। सलिल की एक बूँद की खातिर नित मेघों को निहारता रहता हूँ। समझ बिछौना वसुन्धरा को अम्बर के नीचे रहता हूँ। रज की खुशबू धर ललाट मैं चन्दन तिलक समझता हूँ। धरती का सीना चीर मैं उसमे फ़सल उगाता हूँ अपने स्वेद से सींच उसे मैं जीवन्त बनाता हूँ यूँ ही नही मैं धरा पुत्र,क्षेत्रपाल कहलाता हूँ।। अभिषेक शुक्ला सीतापुर

तुम मुझसे कहते थे

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तुमने मुझ संग प्रीत लगायी थी मुझे प्रेम की भाषा सिखलायी थी हम एक -दूजे संग जीते थे संग हँसते,जीते,रोते थे तुम हर पल मुझसे कहते थे प्रणय को परिणय तक पहुँचाऊँगा, सात जन्मों तक यह रिश्ता निभाउंगा निज स्वजनों का ले आशीष तुम्हे घर की वधू बनाऊंगा अकस्मात! मैं दुर्घटना का शिकार हुई, मुझ पर यह कैसी दुर्भाग्य की मार हुई मेरे रंग रूप के बदलते ही, प्रियतम तुम भी बदल गये जीवन भर साथ निभाने की, सारी कसमे तुम छोड़ चले चेहरे के इस परिवर्तन को देख, तुम मेरा प्रेम व सद्गुण भूल चले जी लेती तुम संग भूल,यह एसिड अटैक की घटना पर तेरे धोखे के शूल,वह जीवन की बड़ी दुर्घटना अभिषेक शुक्ला सीतापुर

रण बान्कुरो को नमन

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देशहित में जो प्राण हते, वही माई का लाल है। सीमा पर करे सुरक्षा,जागे दिन हर रात है। उन सपूतो को वन्दन करता,मेरा देश महान है। उन्ही के कारण हम है सुरक्षित, उन्ही से अपना मान है। सर्दी,गर्मी ,बारिश में भी वो हमेशा तैनात है। और हर हाल दुश्मन को देता मात है। उन रण बांकुरों को अभिषेक दिल से करता सम्मान है। उन्ही से पावन धरा का पल पल बढ़ता मान हैं।

धरा का भूषण

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वृक्ष धरा का भूषण कहलाते हैं ये पर्यावरण प्रदूषण मिटाते हैं। हमें पेड़ पौधे लगाना चाहिए, पर्यावरण को स्वस्थ्य बनाना चाहिए। हमें ये फल,फूल व प्राण वायु देते हैं, अपनी छाया से हमारे सारे दुख दर्द हर लेते हैं। पेड़ पौधों से ही पृथ्वी सुंदर दिखती है, हरियाली से ही हमें सुख शांति मिलती है। जीवन के लिए हमें पर्यावरण को बचाना होगा, हमें अवश्य ही पेड़ पौधे लगाना होगा। -अभिषेक शुक्ला "सीतापुर"

आजादी के मतवाले

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"आजादी के मतवाले हँसकर फंदे पर झूल गये, बोलो उन वीर सपूतो को हम सब कैसे भूल गये। मंगल पांडेय ने देखो आजादी का बिगुल बजाया था, टोली संग अपनी अंग्रेजो को खूब मजा चखाया था। रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजो के छक्के छुड़ा दिये, अपनी तलवार से जाने कितने दुश्मन मिटा दिये। आजादी की परिभाषा चंद्रशेखर आजाद सिखा गये, अल्फ्रेड पार्क मे न जाने वह कितनी लाशे बिछा गये। ऊधमसिंह सबको स्वाभिमान से रहना सिखा गये, जलियावाले का ले बदला डायर को मजा चखा गये। सुभाष चन्द्र बोस शान से 'जय हिंद'का नारा लगा गये, सम्पूर्ण विश्व को सेना का अनुशासन व महत्व सिखा गये। भगत सिंह,सुखदेव,राजगुरु के भी अंदाज निराले थे, ये सब वीर सपूत भारत की आजादी के सच्चे दीवाने थे। अशफाक खाँ ,राजनरायन मिश्र आजादी की राह दिखा गये, कर आहुत अपने प्राण वो भी शान से तिरंगा फहरा गये । मोहम्मद इकबाल इस देश की शान से शौर्य गाथा गा गये, 'सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा' ये सबको बता गये। ये देश प्रणाम उन वीर सपूतो को आज भी प्रतिपल करता है, जो आजादी दिला गये उनको नमन "अभिषेक" यह करता है।" ...

दोस्ती

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रिश्तो में छाँव सा है दोस्ती का मान, इससे मिलता है हर पल अभिमान। मित्र हर परिस्थिति में बढ़ाता है हाथ, कर्ण ने दिया समर में दुर्योधन का साथ। श्रीकृष्ण ने सुदामा संग मित्रता निभाई, क्षण भर में ही दरिद्रता मिटाई। हजारो की भीड़ में कोई ऐसा होना चाहिए, जो आपको समझे और आप सा होना चाहिए। दोस्ती की परिभाषा श्रीकृष्ण व कर्ण ने समझाई, सम्पूर्ण विश्व को इस रिश्ते की सच्चाई समझाई। मित्र हो श्रीकृष्ण व कर्ण समान, इन्ही से बढ़ता है मित्रता का मान।। अभिषेक शुक्ला सीतापुर शिक्षक,साहित्य साधक व विचारक

मुझे न पाओगे

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"तुमसे मिलने को अब हम न कहेगे, कोई गिला शिकवा अब हम न करेगे। तुम बुलाओगे मुझे भीड़ मे भी आवाज देकर, इस बात का हम भी बेसब्री से इन्तजार करेंगे। तू सदा खुश रहे अपनो की महफिल मे, ये दुआ हम भी अपने दिल से करेगे। सिहर उठोगे उन बहारो से जो मुझे छूकर तुम तक जायेगे, महक उठेगी जब फिज़ाये तो खुद को न रोक पाओगे। मिलने को तडप उठोगे तब मेरे दीदार को आओगे, सांसे थम चुकी होगी मेरी तब तुम मुझे न पाओगे।" *अभिषेक शुक्ला सीतापुर*