मेरी मेहनत

'मेरी मेहनत का सबूत माँगते है जमाने वाले, उन्हे न पता कैसे रहते है हम मजदूरी वाले। अपनी कड़ी मेहनत से चार पैसे कमाकर, पेट भरते है हम टपकती झोपड़ी वाले। जब भी ना टपके पसीना हमारे माथे से, उस दिन भूखे रहते है हम दिहाडी वाले। छोटे से बड़ा बन जाना होता नही है आसान, नसीब के खेल जानते है हम बदकिस्मत वाले। छालों मे छिपी लकीरों को कोई नही पढ़ता, ये दर्द जानता है या उसे हम सहने वाले।।' रचनाकार:- अभिषेक शुक्ला 'सीतापुर'